मेरे अरमान.. मेरे सपने..


Click here for Myspace Layouts

रविवार, 10 सितंबर 2017

" प्यार के खेल निराले " 💝



" प्यार के खेल निराले "
~~~~~~~~~~~~






" प्यार के खेल निराले "
~~~~~~~~~~~~💝

मैं उन दोनों के प्यार की साक्षी थी ।
मैं न होती तो शायद कहानी न होती ?

वो महलों का शहजादा !
ये गलीयों की राजकुमारी !
जब दोनों का प्यार बढ़ा,
तो उस अहसास को,
न चाहते हुए भी मैने भांप लिया ---
(कहानी का श्री गणेश )
मुझे पता था दूरियां बहुत है ।
रास्ते कठिन है ।
क़दमों में ताकत नही ?
ओर हाथ बहुत छोटे है।

अपने रूँधे गले से पुकार भी तो नही पाई थी वो ---" साहिब ????
तब उसके आंसू के एक -एक क़तरे की मैं ही तो साक्षी थी।

उस दिन वो मासूम सी नन्ही लड़की ---
अपने घर के आंगन में चमेली के मंडवे तले सहेलियों के साथ आंख मिचौली खेल रही थी ।
ओर कुछ दूर अपनी बगिया में टहलता वो शहजादा, 
एकटक उस परी की खूबसूरती को घूंट - घूंट पी रहा था।
बरबस मेरी निगाहें उस सौन्दर्य प्रेमी से टकरा गई , 
उसने भी कोतुहल से मुझे निहारा --- उसकी आँखों मे अनगिनित सपनें कुलांचे मार रहे थे ।


उस दिन उस परालोक में मैंने भी कुछ पल हिचकौले खाये थे ।
पर वो हुश्न की मल्लिका अपनी ही मस्ती में चूर पता नही किन ख़यालों में गुम थी।
उसका ये भोला प्रहार मुझे भी अंदर तक सहला गया था।
मैं उसके प्यार की मूक साक्षी बनी टुकुर - टुकुर देखने को विवश थी।
ओर वो बेचारा दूर खड़ा विवशता से अपने हाथ मसल रहा था ---

" प्यार पर बस तो नही है मेरा लेकिन फिर भी ----
तू बता दे के तुझे प्यार कंरू या न करूं ..."


मुझे उस समय इसी गीत की पंक्तियां सुनाई दे रही थी।
और जब उसकी मूक आंखों का निमंत्रण उस सुंदरी को मिला ;
तो चोंककर उसने उधर देखा ----
 कोई उसे अजीब -सी निग़ाहों से घूर रहा था,
और वो उसके प्रवाह मे बहती जा रही थी,
मानो खुद पर उसका नियंत्रण ही न रहा हो ।

मैं उस जादू भरे संगीतमयी माहौल की इकलौती गवाह थी।
"मैं नही होती तो कहानी कैसे जवां होती !

फिर रात के साथ बात का सिलसिला जो शुरू हुआ तो महीनों बीत गए कुछ पता ही नही चला ।
न खत्म होने वाला ये सिलसिल आखिर कब तक चलता ; 
एक दिन बादशाह के कानों तक इनके इश्क़ के चर्चे पहुंच ही गए 
और वही हुआ जो अक्सर होता है । 
शहजादे के इश्क पर पहरे ओर राजकुमारी के पैरों में बेड़िया ?
चांदी की बेड़ियाँ !!!
जिन्हें अबला पहन तो सकती है पर उतार कर फैक नही सकती।

मैं इस कहानी में आ तो गई थी पर, उनको मिलाना शायद मेरे भी बस में नही था।
वो कहते है ना, जिनको मिलना हो तो कायनात भी मिलाने में कोई कसर नही छोड़ती ।
 लेकिन, यहां बात उल्टी थी---
 उनके मुकद्दर में मिलना मुमकिन ही नही था ,
तो वो फिर कैसे मिल सकते थे ?
ओर फिर वो नदी के दो पाट की तरह साथ - साथ रहे ,
 साथ तो थे पर जुदा - जुदा ..

कहानी यहि खत्म हुई पर सम्पूर्ण नही ?
क्या हर कहानी में नायक ओर नायिका का मिलन सम्भव होना जरूरी है ?
शायद "हा" भी शायद "ना" भी ????
और उनकी भी कहानी अधूरी रह गई !!!!!!!!!
--- दर्शन के दिल से @


बुधवार, 23 अगस्त 2017

यात्रा जगन्नाथपुरी ( YATRA JAGANNATHPURI -- 10 )



* यात्रा जगन्नाथपुरी * 
भाग  -- 10
काशी विश्वनाथ  





28 मार्च को मेरा जन्मदिन था और इसी  दिन मैं अपनी सहेली और उसके परिवार के साथ जगन्नाथपुरी की यात्रा को निकल पड़ी |

4 अप्रैल 2017 

कल बहुत थकान के कारण जो नींद आई तो बस सुबह नींद ही नहीं खुली फिर एकदूसने ने आपस में उठाया और तैयार हुए और निकल पड़े पैदल ही काशी विश्वनाथ के दर्शन करने। ..... 

काशी विश्वनाथ मंदिर;---
वाराणसी मंदिरों का शहर भी कहलाता है इसके हर चौराहे पर एक मंदिर स्थित है। काशी विश्वनाथ मंदिर ज्योतर्लिंग भी है इसलिए इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है। इसका वर्तमान स्वरूप इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने सन 1780 में किया था ,इस मंदिर के शिखर के लिए सन 1839  में सोना पंजाब के शासक पंजाब केसरी सरदार रणजीत सिंह ने दिया था।अब ये मंदिर सरकार की देखरेख  में है ।   
 इस मंदिर को मुगल सम्राट ओरंगजेब ने ध्वस कर दिया था और मस्ज़िद का निर्माण कर दिया था। बाद में अलग और नजदीक ही इस मंदिर का पुनः निर्माण हुआ। यहाँ और भी अनेक प्रसिध्य मंदिर है।  


सुबह रोड खाली था और हम जहाँ रुके थे वहां से मंदिर ज्यादा दूर नहीं था हम जल्दी ही मंदिर के प्रगांढ़ में पहुंचे पर ये क्या? यहाँ तो काफी लम्बी लाईन लगी थी और पुलिस की फ़ौज खड़ी थी हम भी लाईन में लग गए।  लेकिन कुछ देर बाद एक लड़का आया जो एक आदमी के 200 रु लेकर हमको जल्दी शॉर्ट कट रास्ते से अंदर जाने को बोलने लगा ,मुझे बहुत गुस्सा आया मैंने उसको डांट कर भगा दिया। लेकिन वो पीछे कहा छोड़ने वाला था फिर हमारे पीछे लग गया आखिर में मोलभाव कर के हमको 500 रु में लेकर जाने को तैयार हो गया. 

हमको लेकर वो पास की गली में चला गया काफी दूर चलकर जाने के बाद हमको एक गेट दिखा जहाँ पुलिस खड़ी थी और एक- एक कर के अंदर गली में जाने दे रही थी ,हमारा वाला छोकरा भी पुलिस के पास जाकर कुछ गुटरगूं  किया और हमको भी अंदर जाने दिया।  अंदर जाकर हम लाईन में खड़े हो गए और मंदिर में प्रवेश किया जल्दी ही हम जंजीरो से जकड़े ,रेलिंग लगे काशी विश्वनाथ को देख रहे थे। हमारे हाथ में पकड़ा दूध और फूल फेंकते हुए पुलिस वालो ने हमको बहार खदेड़ दिया और हम मुर्ख बने बहार निकल अपने आपको शहंशाह समझ आगे बढ़  गए अगली मंजिल की ओर। ..और आगे पंडितो ने हमको ठग लिया पूजा के नाम पर और हम भी अपने आपको चंगेज खां समझते हुए 500 -500 का पत्ता लुटा आये। 
  
मुझे सिर्फ इस बात का दुःख है की  मुझे मंदिर में ठीक से हाथ भी जोड़ने नहीं दिया गया और मैं अपने आराध्य देवता को ठीक से देख भी नहीं पाई। क्या फ़ायदा इतनी दूर से हम आते है और भागमभाग में रहते है।  

इतिहास ;--

चलिए अब कुछ रौशनी डाली जाये वाराणसी के इतिहास पर 

वाराणसी यानी बनारस यानी काशी उत्तरप्रदेश का बहुत प्रसिध्य शहर है। इसको भारत का प्राचीन शहर भी कहते है। हिन्दू धर्म में इसको पवित्र नगरी माना  गया है। शास्त्रीय संगीत का बनारस घराना यही जन्मा  और यही विकसित हुआ है। यहाँ कबीर , रविदास, स्वामी रमानन्द,वल्ल्भाचार्य,मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद,पंडित रविशंकर, पंडित हरी प्रसाद चौरसिया,और उस्ताद बिस्मिल्लाह खां इसी शहर की देन है। 
कहते है इस शहर को शिव ने बसाया था यहाँ की बनारसी साड़ियां विश्वभर में प्रसिध्य है। यहाँ का पान ,कलाकंद ,इत्र और रेशमी कपड़ा भी प्रसिध्य है। 
यहाँ गंगा नदी के किनारे कई घाट बने है जिनकी अपनी ही विशेषता है ;--
1. दशमेश घाट ;-- यह घाट ब्रह्माजी ने बनाया है और यही गंगाजी की आरती होती है। 
2. मणिकर्णिका घाट ;-- यह घाट शिव को समर्पित है यहाँ शव जलाये जाते है। 
3. सिंधिया घाट ;-- इस घाट को ग्वालियर की महारानी ने बनवाया था। 
4. मानमंदिर घाट ;-- इसको जयपुर महाराजा द्वितीय ने बनवाया था।  
5. ललित घाट ;-- इस घाट को नेपाल नरेश ने बनवाया था। 
और भी अनेक घाट बने हुए है। 
  
अब हम आराम से बाहर निकलकर पैदल ही चल दिए ,सबसे पहले तो पेट के चूहों को शांत किया ,बनारस की गरमा गर्म कचौरी और जलेबी से फिर निकल पड़े बनारस की गलियों से होते हुए गंगाजी के घाट पर। 
घाट पर हमने एक नाव किराये पर ली और हम भी बह चले गंगाजी की मोझो के साथ .... 
नाव का किराया 700 रु अदा किया गया था। 

नाव में एक घंटा घूमकर हमने सारे घाटों का जायजा लिया और बीचो बीच गंगाजी के गए जहाँ शांत भाव से गंगाजी बह रही थी और मुझे स्वर्गीय भूपेंद्र हजारिका का गाना याद आ रहा था ----

''विस्तार है अपार 
प्रजा दोनों पार 
करे हाहाकार 
निःशब्द  सदा     
ओ गंगा तुम 
ओ गंगा बहती हो क्यों .........  

यात्रा जगन्नाथ पुरी की समाप्त। 


नदी में डूबा मंदिर 












हमारी नाव 



 बीचोबीच ठहरी हुई गंभीर गंगा  







फाइव स्टार होटल वालो की नाव 




काशी विश्वनाथ मंदिर ( चित्र -गूगल )




गंगा आरती ( चित्र -गूगल )








यात्रा जगन्नाथपुरी ( YATRA JAGANNATHPURI -- 9 )



*यात्रा जगन्नाथपुरी* 

भाग -9  

बनारस भाग -2   



सीता जी 



28 मार्च को मेरा जन्मदिन था और इसी  दिन मैं अपनी सहेली और उसके परिवार के साथ जगन्नाथपुरी की यात्रा को निकल पड़ी |

3 अप्रैल 2017 

कल हमने भुवनेश्वर खूब घुमा रात को बहुत थकान हो गई थी इसलिए बाहर ही खाना खाकर आये और जो लुढ़के तो सुबह नींद खुली।  संब सो रहे थे क्योकि आज 12 ;30  बजे की ट्रेन से हमको बाराणसी यानी बनारस जाना था। ----हम है बनारसी बाबू  ... 

हम नाश्ता कर स्टेशन पर आ गए गर्मी बहुत थी। हमारी ट्रेन नीलांचल एक्सप्रेस ठीक अपने निर्धारित टाईम 12 ;30 पर भुवनेशवर स्टेशन पर आ गई और हमने ट्रेन में अपनी सीट पर पहुंचकर  A c की ठंडी हवा से राहत पाई ।  भुवनेश्वर से बनारस का रास्ता काफी लम्बा है 1098 KM का रास्ता तैय करती है ये ट्रेन और इसका आखरी मुकाम है नई दिल्ली। हम कल सुबह 6 बजे ही बनारस पहुंचेगे। रास्ते में गाना गाते गुनगुनाते और ताश खेलते कब सफर कट गया पता ही नहीं चला।

वाराणसी पहुंचकर हम कार से इलाहबाद पहुंचे त्रिवेणी में स्नान कर हम किनारे पहुंचे। .. अब आगे ----- 

गंगा स्नान कर हम कपड़े बदलकर सीतामढ़ी को चल दिए। 

इतिहास ;---
सीतामढ़ी ,उत्तरप्रदेश राज्य के भदौही जिले में स्थित है,हाल ही में भदौही जिले का नाम संत रविदास नगर भी रखा गया था ।जिला भदौही कॉरपेट सिटी के नाम से भी विख़्यात है यहाँ के कालीन दुनियां भर में फ़ेमस है। सीतामढ़ी मंदिर इलाहबाद और वाराणसी के मध्य स्थित है और जंगीगंज बाजार से 11 किलोमीटर दूर गंगा किनारे ही स्थित है कहते है यहाँ सीतामाता धरती में समा गई थी। यहाँ हनुमानजी  की 110 फीट ऊँची मूर्ति है। यह मूर्ति विश्व में सबसे ऊँची हनुमान जी की मूर्ति के लिए प्रसिध्य है।

  

सीता समाहित स्थल ;--

इस मंदिर के आसपास महुए के पेड़ बहुतयात में लगे थे गर्मी बहुत थी सामने ही हनुमान जी की 110 फीट उंच्ची प्रतिमा लगी हुई थी इस प्रतिमा की पूंछ टूट गई थी जिसके कारण निचे बना मंदिर भी टूट गया था और अब यहाँ उसका निर्माण हो रहा था। आगे जाकर हमको शिवजी का एक मंदिर मिला जिसको गुफा की तरह बनाया गया था और जिसके शिखर पर भगवान शिव खुद बिराजमान थे और उनकी जटाओ में से गंगा निकल रही थी। कुछ आगे सीतामाता का मंदिर बना हुआ था , यह मंदिर मुझे पुराना नहीं लगा नया ही बना हुआ लगा लेकिन यहाँ तक गंगा नदी आई हुई थी चारों और गंगा का पानी फैला हुआ था। हो सकता है पानी रोककर रखा  गया हो क्योकि कुछ दूर गंगा का घाट नजर आ रहा था। मंदिर के अंदर सीता माता की मूर्ति थी और ऊपर के माले पर एक बड़ा सा सीतामाता का स्टैचू बना हुआ था।
कुछ आगे जाकर लवकुश के जन्मस्थान और महर्षि वाल्मीकि के आश्रम भी बने हुए थे। पर ये सब मुझे नए ही बने हुए दिखे कोई भी पुरातन मंदिर मुझे नहीं मिला। 

यहाँ से निकलकर हम सीधे वाराणसी को चल दिए ,मुझे गंगा आरती देखनी थी क्योकि कल हमारी गाड़ी थी और आज ही सब निपटाना था। सारा दिन भूखे प्यासे घूम रहे थे खाना भी किसी ने नहीं खाया था इसलिए एक जगह रूककर सबने चाय पी और हल्का नाश्ता किया और फिर अपनी मंजिल को चल दिए। लेकिन, बनारस की छोटी- छोटी गलियों और रास्ते पर भयंकर जाम होने के कारन हम रात तक वाराणसी पहुंचे और गंगा आरती से महरूम हो गए। सूरज को जीप का 3300 किराया चुकाकर बिदा किया और दिनभर थकेहारे हम भी खाना खा अपनी धर्मशाला में आकर सो गए। 

कल बाबा विश्वनाथ के दर्शन और गंगा भ्रमण    

  

 हनुमान जी 110 फिट ऊँची प्रतिमा 



गूगल बाबा से लिया चित्र जब हनुमानजी की पूंछ सलामत थी 


 शिव जी का मंदिर 


और ये मैं ---शिव भक्तन 







 हमारी टीम 


 कहते है यही सीता जी घरती में समाई थी एक चित्रकार का बनाया चित्र 



हमारी टीम  



 चारों और गंगा बिच में बना मंदिर 


 मेरे पीछे गंगा नदी 



महुये का पेड़ 


 मंदिर का चित्र गूगल बाबा से 


सीतामाता का मंदिर 







शनिवार, 1 जुलाई 2017

यात्रा जगन्नाथपुरी ( YATRA JAGANNATHPURI -- 7 )



*यात्रा जगन्नाथपुरी* 
 भाग 7 
भुवनेश्वर भाग -- 2

उदयगिरि की गुफायें -- हाथी गुफ़ा 



28 मार्च को मेरा जन्मदिन था और इसी  दिन मैं अपनी सहेली और उसके परिवार के साथ जगन्नाथपुरी की यात्रा को निकल पड़ी |

1 अप्रैल 2017 
हमने दो दिन खूब पुरी घूमा ,सूर्यमंदिर देखा और  भी यहाँ के अन्य धार्मिक स्थल देखे।  अब हमने भुवनेश्वर  को प्रस्थान किया ,पूरी से चलकर हम रस्ते के पीपली गाँव रूककर वहां से उड़ीसा की फ़ेमस पेंटिंग्स खरीदते हुए भुवनेश्वर पहुंचे ,हमको जो ऑटो वाला पुरी से लाया था उसने हमको लिंगराज मंदिर के सामने छोड़ दिया क्योकि हम महेश्वरी धर्मशाला ढूँढ रहे थे और वो लिंगराज मंदिर के पास ही थी लेकिन वहां हमको सीलनभरे रूम मिल रहे थे और उनका किराया भी ज्यादा था नार्मल रूम का 300 रु और  ऐ. सी. रूम का 500 रु वो हमको ज्यादा लगा इसलिए हमने नजदीक एक दो होटल और देखे पर कुछ समझ नहीं आये फिर किसी ने सुझाव दिया की आप स्टेशन के नजदीक ही होटल देखे वहां अच्छे होटल मिल जायेगे और हम एक ऑटो  में बैठ चल दिए। 

होटल राधा किशन में हमको ऑटो वाला लाया हमको रूम पसंद आया जो सिर्फ 1500 रु में था छोटा था पर ऐ,सी. था और  हम पांचो को कम्फर्ट था अपना सामान वही पटक हम फ्रेश हो निकल पड़े धौली गिरि शांति स्तूप देखने।  ऑटो होटल वाले ने ही कर दिया था जो हमको धौली गिरि शांति स्तूप , उदयगिरि, खंडगिरि  और लिंगराज मंदिर दिखाने  वाला था। 

सबसे पहले हम धौली गिरि शांतिस्तूप देखने पहुंचे। गर्मी अपनी चरम स्थति में थी गर्मी भी बहुत थी ज्यादा रुके नहीं वही एक पेड़ के नीचे बैठ गये लेकिन हमारे दोनों जग्गा जासूस स्तूप की कई सीढिया चढ़कर ऊपर पहुंच गए फिर हमने भी दूर से कई फोटू खिचवाये। 

धौली गिरि शांतिस्तूप का इतिहास ;---

धोलीगिरि शांति स्तूप  धोलीगिरि हिल्स पर स्थित है  और भुवनेश्वर से 8 किलोमीटर दूर दया नदी के नजदीक बना हुआ है इसके नजदीक काफी खुला मैदान है और एक छोटी सी पहाड़ी है पहाड़ी के शिखर पर अशोक के शिलालेख लिखे हुए है  1970  क़े दशक में जापान के एक बोध्य संध ने  यहाँ एक सफ़ेद शांति स्तूप बनवाया जिसे हम देखने गए। 

उदयगिरि की गुफाये;---- 

यहाँ से हम ऑटो में बैठ उदयगिरि की गुफाये देखने को चल दिए।  हमको दूर से ही एक छोटे से पहाड़ पर गुफाये दिखने लगी। मुझे थोड़ी परेशानी थी चलने में लेकिन धीरे धीरे मैंने फतह पा ली ऊपर जाकर विस्मय सी हो गई। गुफाये अद्भुत थी अतुलनीय भारत   
 टोटल 20 गुफाये थी कुछ गुफाये तो 4 वीं और 5 वीं सदी से जुडी थी। नंबर 1 और 20 जैन धर्म से संबंधित है ये समस्त गुफाये उत्त्खलन से निकली है  10 वीं शताब्दी में जब परमारो का राज्य था तब राजा भोज के पौत्र उदयादित्य  ने इस स्थान का नाम उदयगिरि रखा। 

उदयगिरि पहाड़ पर चढकर सारी गुफाये देखकर थकान ऐसे छूमंतर हो गई की क्या कहने फिर हमने खूब ढेरों फोटू खींचे लेकिन खंडगिरि गुफाओ तक जाने का साहस नहीं हुआ और हम नीचे उतर आये। 
नजदीक ही एक रेस्ट्रॉ में बैठकर चाय नाश्ता किया और चल पड़े आज के आखरी सफर लिंगराज  मंदिर की और  .... 

लिंगराज मंदिर ;--
लिंगराज मंदिर भगवान शिव को समर्पित है यह भुवनेशवर का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर को ललातेडुकेशरी  ने 617 - 657 ई. में बनवाया था। यह मंदिर विशाल और अपनी मूर्तिकला के लिए प्रसिध्य है इस मंदिर की प्रत्येक मूर्ति कारीगरी और शिल्प में बेजोड़ है।  गणेश, कार्तिकेय और गौरी के भी मंदिर बने हुए है। गौरी मंदिर में पार्वती की काले पत्थर की प्रतिमा बनी हुई है। यहाँ बिंदु सागर सरोवर बना हुआ है  और शिव के  8 फीट मोटे और एक फिट ऊँचे ग्रेनाइट पत्थर से बने शिवलिंग है। 
इस मंदिर का निर्माण सोमवंशी राजा जजाति केशरी ने 11 वीं शताब्दी में करवाया था इस मंदिर का प्रागंड़ 150 मीटर वर्गाकार और कलस की ऊंचाई 40 मीटर है। अप्रैल के महीने में यहाँ रथ यात्रा निकलती है  
हम लिंगराज मंदिर पहुंचे तो हमारा सारा सामान मोबाईल, कैमरा वगैरा सब काउंटर पर जमा करवाना पड़ा इसलिए यहाँ का एक  भी फोटू नहीं है। 

मंदिर घुमकर अपना सामान ले हम वापस ऑटो में आ गए और अपने होटल की तरफ चल पड़े आज बहुत थक गए थे इसलिए नजदीक ही एक होटल में खाना खाकर ही अपने होटल आये और कुछ देर गप्पशप कर के सब सो गए। .. 
 कल हमको वाराणसी जाना है। .. 




 धौलीगिरि शांति स्तूप 



 धौलीगिरि शांति स्तूप 




 धौलीगिरि शांति स्तूप 



 उदयगिरि की पहाड़ी पर चढ़ती मैं  




 उदयगिरि की गुफाये 



 उदयगिरि की गुफाये 


 उदयगिरि की गुफाये 


 उदयगिरि की गुफाये 











शांति स्तूप के बहार पेड़ के निचे विश्राम 
    


 उदयगिरि की गुफाये 


दूर दिखता खंडगिरि 




जय हो उदयगिरि। ....  हेंड्सअप !!!

 उदयगिरि की गुफाये --बहार  ही बहार 



ज़ोर लगा के हाई.....शा।  खसक ही नहीं रहा :)


भगवान कृष्ण की मुद्रा में 



बगैर दरवाजें की बनी गुफ़ाएँ --बोध्य भिक्षुओं को किस का डर  











गुरुवार, 29 जून 2017

श्री हरिशर्मा जयपुर वाले


*ओ दूर के मुसाफिर हमको भी साथ ले ले रे हम रह गए अकेले*

28 जून 2017   

आभासी दुनियां के हमारे अभिन्न मित्र,ब्लॉगर  श्री  हरिशर्मा जयपुर वाले काल के क्रूर पंजो में समां गए। आज 28 जून 2017 की मनहूश धड़ी उनको हमसे दूर ले गई।  उनके जाने के बाद वो स्थान हमेशा  ख़ाली रहेगा जिसे अब कोई नहीं भर सकता।  


इतनी भी क्या जल्दी थी 
तुमको रब से मिलने की
अभी तो पैरो के
महावर भी नही छूटे
कलाइयों की चूड़ियां भी
नही खनकी,
मेंहदी भी लगी है
हाथों में---
ओ.. दूर के मुसाफिर
तनिक, इक पल मेरा तो इंतजार करते ? 
तसव्वुर में सजा लेती !
जुड़े में छिपा लेती !!
आंखों में समा लेती !!!
या खुद ही साथ हो लेती ----
ओ... दूर के मुसाफिर
तनिक, इक पल मेरा तो इंतजार करते ?